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mahabharat 5.27.6: हे प्रिये! जो मनुष्य धर्म, अर्थ और काम - इन तीनों में धर्म को ही प्रधान मानता है और उसके अनुसार आचरण करता है, वह अत्यंत तेजस्वी होता है और सूर्य के समान चमकता है; परंतु जो मनुष्य धर्म से रहित है और जिसकी बुद्धि पापों में लगी हुई है, वह सम्पूर्ण पृथ्वी को पाकर भी दुःख भोगता रहता है॥6॥   |   mahabharat अध्याय 5.27: संजयका युधिष्ठिरको युद्धमें दोषकी सम्भावना बतलाकर उन्हें युद्धसे उपरत करनेका प्रयत्न करना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 27: संजयका युधिष्ठिरको युद्धमें दोषकी सम्भावना बतलाकर उन्हें युद्धसे उपरत करनेका प्रयत्न करना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.27.6 
धर्मं कृत्वा कर्मणां तात मुख्यं
महाप्रताप: सवितेव भाति।
हीनो हि धर्मेण महीमपीमां
लब्ध्वा नर: सीदति पापबुद्धि:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
हे प्रिये! जो मनुष्य धर्म, अर्थ और काम - इन तीनों में धर्म को ही प्रधान मानता है और उसके अनुसार आचरण करता है, वह अत्यंत तेजस्वी होता है और सूर्य के समान चमकता है; परंतु जो मनुष्य धर्म से रहित है और जिसकी बुद्धि पापों में लगी हुई है, वह सम्पूर्ण पृथ्वी को पाकर भी दुःख भोगता रहता है॥6॥
 
O dear! A man who considers Dharma to be the most important among all three - Dharma, Artha and Kama, and who acts accordingly, becomes very glorious and shines like the Sun; but a man who is devoid of Dharma and whose intellect is engaged in sins, continues to suffer even after having the entire earth. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)