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mahabharat 5.27.3: मनुष्य का यह जीवन अत्यन्त अल्पकालीन है। इसमें बड़े-बड़े दोष लगे रहते हैं जो इसे दुर्बल कर देते हैं। यह सदैव दुःख और अशांति से भरा रहता है। अतः हे पाण्डुपुत्र! युद्ध का पाप मत करो। यह तुम्हारे यश के अनुकूल नहीं है। ॥3॥   |   mahabharat अध्याय 5.27: संजयका युधिष्ठिरको युद्धमें दोषकी सम्भावना बतलाकर उन्हें युद्धसे उपरत करनेका प्रयत्न करना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 27: संजयका युधिष्ठिरको युद्धमें दोषकी सम्भावना बतलाकर उन्हें युद्धसे उपरत करनेका प्रयत्न करना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.27.3 
अल्पकालं जीवितं यन्मनुष्ये
महास्रावं नित्यदु:खं चलं च।
भूयश्च तद् यशसो नानुरूपं
तस्मात् पापं पाण्डव मा कृथास्त्वम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य का यह जीवन अत्यन्त अल्पकालीन है। इसमें बड़े-बड़े दोष लगे रहते हैं जो इसे दुर्बल कर देते हैं। यह सदैव दुःख और अशांति से भरा रहता है। अतः हे पाण्डुपुत्र! युद्ध का पाप मत करो। यह तुम्हारे यश के अनुकूल नहीं है। ॥3॥
 
This life of a human being is very short-lived. It is subjected to great faults which weaken it. It is always full of sorrow and restlessness. Therefore, O son of Pandu, do not commit the sin of war. It is not in accordance with your good fame. ॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)