Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 5.27.1: संजय ने कहा— पाण्डुपुत्र! तुम्हारा प्रत्येक कर्म सदैव धर्मानुसार ही होता है। हे कुन्तीपुत्र! तुम्हारे धर्माचरण संसार में न केवल प्रसिद्ध हैं, अपितु प्रत्यक्ष भी हैं। यद्यपि यह जीवन क्षणभंगुर है, फिर भी इससे महान यश प्राप्त किया जा सकता है। पाण्डव! तुम्हें जीवन के क्षणभंगुर स्वरूप को देखना चाहिए और अपने यश को नष्ट नहीं होने देना चाहिए।॥1॥ | mahabharat अध्याय 5.27: संजयका युधिष्ठिरको युद्धमें दोषकी सम्भावना बतलाकर उन्हें युद्धसे उपरत करनेका प्रयत्न करना । mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
संजय उवाच
धर्मनित्या पाण्डव ते विचेष्टा
लोके श्रुता दृश्यते चापि पार्थ।
महाश्रावं जीवितं चाप्यनित्यं
सम्पश्य त्वं पाण्डव मा व्यनीनश:॥ १॥
अनुवाद
संजय ने कहा— पाण्डुपुत्र! तुम्हारा प्रत्येक कर्म सदैव धर्मानुसार ही होता है। हे कुन्तीपुत्र! तुम्हारे धर्माचरण संसार में न केवल प्रसिद्ध हैं, अपितु प्रत्यक्ष भी हैं। यद्यपि यह जीवन क्षणभंगुर है, फिर भी इससे महान यश प्राप्त किया जा सकता है। पाण्डव! तुम्हें जीवन के क्षणभंगुर स्वरूप को देखना चाहिए और अपने यश को नष्ट नहीं होने देना चाहिए।॥1॥
Sanjay said— Son of Pandu! Your every action is always in accordance with Dharma. O son of Kunti! Your actions based on Dharma are not only famous in the world, but can also be seen. Although this life is temporary, yet great fame can be achieved through it. Pandava! You should look at the temporary nature of life and do not let your fame be destroyed.॥ 1॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥