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mahabharat 5.26.3: मनुष्य युद्ध के विषय में क्यों सोचेगा? जिसे देवताओं ने जानबूझकर युद्ध करने का शाप दिया है? कुंती के पुत्र सुख की इच्छा रखते हुए केवल वही कर्म करते हैं जो धर्म के विरुद्ध न हों और जिनसे सबका कल्याण हो।॥3॥   |   mahabharat अध्याय 5.26: युधिष्ठिरका संजयको इन्द्रप्रस्थ लौटानेसे ही शान्ति होना सम्भव बतलाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 26: युधिष्ठिरका संजयको इन्द्रप्रस्थ लौटानेसे ही शान्ति होना सम्भव बतलाना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.26.3 
कुतो युद्धं जातु नरोऽवगच्छेत्
को देवशप्तो हि वृणीत युद्धम्।
सुखैषिण: कर्म कुर्वन्ति पार्था
धर्मादहीनं यच्च लोकस्य पथ्यम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य युद्ध के विषय में क्यों सोचेगा? जिसे देवताओं ने जानबूझकर युद्ध करने का शाप दिया है? कुंती के पुत्र सुख की इच्छा रखते हुए केवल वही कर्म करते हैं जो धर्म के विरुद्ध न हों और जिनसे सबका कल्याण हो।॥3॥
 
Why would a man ever think of war? Who has been cursed by the gods to knowingly choose war? Kunti's sons, seeking happiness, perform only those deeds that are not against Dharma and that benefit all people.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)