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mahabharat 5.25.7: जिसमें सबका विनाश ही दिखाई देता है, जो पूर्णतः पाप को जन्म देता है, जो नरक का कारण है, अन्त में केवल दरिद्रता ही प्राप्त होती है और जिसमें जय-पराजय एक समान है, उस युद्ध जैसे कठिन कार्य के लिए कौन समझदार मनुष्य कभी प्रयत्न करेगा?॥7॥   |   mahabharat अध्याय 5.25: संजयका युधिष्ठिरको धृतराष्ट्रका संदेश सुनाना एवं अपनी ओरसे भी शान्तिके लिये प्रार्थना करना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 25: संजयका युधिष्ठिरको धृतराष्ट्रका संदेश सुनाना एवं अपनी ओरसे भी शान्तिके लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  5.25.7 
सर्वक्षयो दृश्यते यत्र कृत्स्न:
पापोदयो निरयोऽभावसंस्थ:।
कस्तत् कुर्याज्जातु कर्म प्रजानन्
पराजयो यत्र समो जयश्च॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जिसमें सबका विनाश ही दिखाई देता है, जो पूर्णतः पाप को जन्म देता है, जो नरक का कारण है, अन्त में केवल दरिद्रता ही प्राप्त होती है और जिसमें जय-पराजय एक समान है, उस युद्ध जैसे कठिन कार्य के लिए कौन समझदार मनुष्य कभी प्रयत्न करेगा?॥7॥
 
In which the destruction of all is visible, which gives rise to sin completely, which is the cause of hell, in the end only poverty is achieved and in which victory and defeat are the same, which sensible person will ever make efforts for that tough task like war? ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)