श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 25: संजयका युधिष्ठिरको धृतराष्ट्रका संदेश सुनाना एवं अपनी ओरसे भी शान्तिके लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  5.25.13-14 
कथं हि नीचा इव दौष्कुलेया
निर्धर्मार्थं कर्म कुर्युश्च पार्था:।
सोऽहं प्रसाद्य प्रणतो वासुदेवं
पञ्चालानामधिपं चैव वृद्धम्॥ १३॥
कृताञ्जलि: शरणं व: प्रपद्ये
कथं स्वस्ति स्यात् कुरुसृंजयानाम्।
न ह्येवमेवं वचनं वासुदेवो
धनंजयो वा जातु किंचिन्न कुर्यात्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
भला! कुन्ती के पुत्र अन्य नीच कुलों में उत्पन्न नीच पुरुषों के समान ऐसा (निन्दनीय) कर्म कैसे कर सकते हैं? जिससे न तो धर्म की सिद्धि होगी और न ही अर्थ की। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ हैं और वृद्ध पांचाल नरेश द्रुपद भी उपस्थित हैं। मैं उन सबको प्रणाम करके उन्हें प्रसन्न करना चाहता हूँ। मैं हाथ जोड़कर आपके पास आया हूँ। आप ही विचार करें कि कुरु और संजय कुलों की उन्नति कैसे हो सकती है। मुझे विश्वास है कि भगवान श्रीकृष्ण या अर्जुन मेरी ऐसी प्रार्थनापूर्वक कही गई किसी भी बात को अस्वीकार नहीं कर सकते॥13-14॥
 
Well! How can Kunti's sons commit such a (condemnable) act like other lowly men born in low castes? Which will lead to neither Dharma nor Artha. Lord Krishna is here and the aged Panchal king Drupada is also present. I want to please them by bowing to them all. I have come to you with folded hands. You yourself think how the Kuru and Sanjaya clans can prosper. I am sure that Lord Krishna or Arjuna cannot refuse any of my words spoken with such prayer.॥13-14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)