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श्लोक 5.23.28  |
न कर्मणा साधुनैकेन नूनं
सुखं शक्यं वै भवतीह संजय।
सर्वात्मना परिजेतुं वयं चे-
न्न शक्नुमो धृतराष्ट्रस्य पुत्रम्॥ २८॥ |
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| अनुवाद |
| संजय! यदि हम धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन को सब प्रकार से नहीं हरा सकते, तो फिर केवल अच्छे आचरण से उसे प्रसन्नतापूर्वक परास्त करना भी हमारे लिए सम्भव नहीं है॥ 28॥ |
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| Sanjay! If we cannot defeat Duryodhana, son of Dhritarashtra, by all means, then it is certainly not possible for us to defeat him happily by merely behaving well.॥ 28॥ |
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इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सञ्जययानपर्वणि युधिष्ठिरप्रश्ने त्रयोविंशोऽध्याय:॥ २३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत संजययानपर्वमें युधिष्ठिरप्रश्नविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३॥
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