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mahabharat 5.22.33-35: मुझे अर्जुन इन्द्र के समान तथा वृष्णि योद्धा श्रीकृष्ण सनातन विष्णु के समान प्रतीत होते हैं। कुन्तीपुत्र पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर धर्म के मार्ग पर चलने में सुख पाते हैं। वे विनयशील और बलवान हैं। उन्होंने कभी किसी के प्रति द्वेष नहीं किया। अन्यथा दुर्योधन के छल से ग्रसित होकर बुद्धिमान युधिष्ठिर क्रोध में मेरे समस्त पुत्रों को भस्म कर देते। संजय! मैं अर्जुन, भगवान श्रीकृष्ण, भीमसेन और नकुल-सहदेव से उतना नहीं डरता, जितना क्रोध से जलते हुए राजा युधिष्ठिर के क्रोध से। मैं उनके क्रोध से सदैव अत्यन्त भयभीत रहता हूँ; क्योंकि वे महान तपस्वी और ब्रह्मचर्य से युक्त हैं, अतः वे जो भी संकल्प मन में करेंगे, वह अवश्य सिद्ध होगा।   |   mahabharat अध्याय 5.22: धृतराष्ट्रका संजयसे पाण्डवोंके प्रभाव और प्रतिभाका वर्णन करते हुए उसे संदेश देकर पाण्डवोंके पास भेजना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 22: धृतराष्ट्रका संजयसे पाण्डवोंके प्रभाव और प्रतिभाका वर्णन करते हुए उसे संदेश देकर पाण्डवोंके पास भेजना  »  श्लोक 33-35
 
 
श्लोक  5.22.33-35 
मतो हि मे शक्रसमो धनंजय:
सनातनो वृष्णिवीरश्च विष्णु:।
धर्मारामो ह्रीनिषेवस्तरस्वी
कुन्तीपुत्र: पाण्डवोऽजातशत्रु:॥ ३३॥
दुर्योधनेन निकृतो मनस्वी
नो चेत् क्रुद्ध: प्रदहेद् धार्तराष्ट्रान्।
नाहं तथा ह्यर्जुनाद् वासुदेवाद्
भीमाद् वाहं यमयोर्वा बिभेमि॥ ३४॥
यथा राज्ञ: क्रोधदीप्तस्य सूत
मन्योरहं भीततर: सदैव।
महातपा ब्रह्मचर्येण युक्त:
संकल्पोऽयं मानसस्तस्य सिद्धॺेत्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
मुझे अर्जुन इन्द्र के समान तथा वृष्णि योद्धा श्रीकृष्ण सनातन विष्णु के समान प्रतीत होते हैं। कुन्तीपुत्र पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर धर्म के मार्ग पर चलने में सुख पाते हैं। वे विनयशील और बलवान हैं। उन्होंने कभी किसी के प्रति द्वेष नहीं किया। अन्यथा दुर्योधन के छल से ग्रसित होकर बुद्धिमान युधिष्ठिर क्रोध में मेरे समस्त पुत्रों को भस्म कर देते। संजय! मैं अर्जुन, भगवान श्रीकृष्ण, भीमसेन और नकुल-सहदेव से उतना नहीं डरता, जितना क्रोध से जलते हुए राजा युधिष्ठिर के क्रोध से। मैं उनके क्रोध से सदैव अत्यन्त भयभीत रहता हूँ; क्योंकि वे महान तपस्वी और ब्रह्मचर्य से युक्त हैं, अतः वे जो भी संकल्प मन में करेंगे, वह अवश्य सिद्ध होगा।
 
To me Arjuna appears like Indra and Vrishni warrior Shri Krishna appears like eternal Vishnu. Kunti's son Pandu's son Yudhishthira finds happiness in following the path of Dharma. He is modest and strong. He has never felt animosity towards anyone. Otherwise, the intelligent Yudhishthira, on being deceived by Duryodhan, would have burned all my sons to ashes in anger. Sanjaya! I am not as afraid of Arjuna, Lord Shri Krishna, Bhimasena and Nakul-Sahdev as I am of the anger of King Yudhishthira who is fuming with anger. I am always very afraid of his anger; because he is a great ascetic and endowed with celibacy, therefore whatever resolution he makes in his mind will surely be accomplished.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)