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mahabharat 5.21.18: वैशम्पायन कहते हैं- हे जनमेजय! तदनन्तर धृतराष्ट्र ने कर्ण को डाँटा और भीष्म का आदर-सत्कार करके उसे समझाया और इस प्रकार कहा-॥18॥   |   mahabharat अध्याय 5.21: भीष्मके द्वारा द्रुपदके पुरोहितकी बातका समर्थन करते हुए अर्जुनकी प्रशंसा करना, इसके विरुद्ध कर्णके आक्षेपपूर्ण वचन तथा धृतराष्ट्रद्वारा भीष्मकी बातका समर्थन करते हुए दूतको सम्मानित करके विदा करना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 21: भीष्मके द्वारा द्रुपदके पुरोहितकी बातका समर्थन करते हुए अर्जुनकी प्रशंसा करना, इसके विरुद्ध कर्णके आक्षेपपूर्ण वचन तथा धृतराष्ट्रद्वारा भीष्मकी बातका समर्थन करते हुए दूतको सम्मानित करके विदा करना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  5.21.18 
वैशम्पायन उवाच
धृतराष्ट्रस्ततो भीष्ममनुमान्य प्रसाद्य च।
अवभर्त्स्य च राधेयमिदं वचनमब्रवीत्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं- हे जनमेजय! तदनन्तर धृतराष्ट्र ने कर्ण को डाँटा और भीष्म का आदर-सत्कार करके उसे समझाया और इस प्रकार कहा-॥18॥
 
Vaishmpayana says - O Janamejaya! Thereafter Dhritarashtra scolded Karna and honoured Bhishma and persuaded him and said thus -॥18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)