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mahabharat 5.21.1: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! पुरोहित के ये वचन सुनकर बुद्धिमान् एवं तेजस्वी भीष्म ने समयानुसार उनकी पूजा करके यह कहा - ॥1॥   |   mahabharat अध्याय 5.21: भीष्मके द्वारा द्रुपदके पुरोहितकी बातका समर्थन करते हुए अर्जुनकी प्रशंसा करना, इसके विरुद्ध कर्णके आक्षेपपूर्ण वचन तथा धृतराष्ट्रद्वारा भीष्मकी बातका समर्थन करते हुए दूतको सम्मानित करके विदा करना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 21: भीष्मके द्वारा द्रुपदके पुरोहितकी बातका समर्थन करते हुए अर्जुनकी प्रशंसा करना, इसके विरुद्ध कर्णके आक्षेपपूर्ण वचन तथा धृतराष्ट्रद्वारा भीष्मकी बातका समर्थन करते हुए दूतको सम्मानित करके विदा करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  5.21.1 
वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा प्रज्ञावृद्धो महाद्युति:।
सम्पूज्यैनं यथाकालं भीष्मो वचनमब्रवीत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! पुरोहित के ये वचन सुनकर बुद्धिमान् एवं तेजस्वी भीष्म ने समयानुसार उनकी पूजा करके यह कहा - ॥1॥
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! On hearing these words of the priest, the wise and illustrious Bhishma, after worshipping him as per the time, said this:॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)