श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 195: कौरव-सेनाका रणके लिये प्रस्थान  » 
 
 
अध्याय 195: कौरव-सेनाका रणके लिये प्रस्थान
 
श्लोक 1:  वैशम्पायन जी कहते हैं - 'हे जनमेजय! तत्पश्चात् प्रातःकाल के समय धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन की प्रेरणा से समस्त राजा पाण्डवों से युद्ध करने के लिए आगे बढ़े।
 
श्लोक 2:  प्रस्थान से पूर्व सबने स्नान किया, शुद्धि की, श्वेत वस्त्र पहने, पुष्पमालाएँ पहनीं, ब्राह्मणों से स्वस्ति मंत्र पढ़वाया, अग्नि में आहुति दी, फिर ध्वजा फहराकर तथा हाथ में शस्त्र लेकर युद्धभूमि की ओर प्रस्थान किया॥ 2॥
 
श्लोक 3:  वे सभी वेदों के विद्वान, वीर योद्धा और उत्तम प्रकार से व्रतों का पालन करने वाले थे। सभी कवचों से विभूषित थे और युद्ध के चिह्नों से सुशोभित थे॥3॥
 
श्लोक 4:  वे महाबली वीर युद्ध में पराक्रम दिखाकर उच्च लोकों को जीतना चाहते थे। वे सब एकाग्रचित्त थे और एक-दूसरे पर विश्वास रखते थे॥4॥
 
श्लोक 5:  अवन्ति के राजकुमार विन्द और अनुविन्द, केकय के राजकुमार तथा बाह्लीक देश के सैनिकों सहित वे सभी द्रोणाचार्य के आगे-आगे चले॥5॥
 
श्लोक 6-8:  अश्वत्थामा, सिन्धुराज भीष्म, दक्षिणदेश के राजा जयद्रथ, पश्चिम और पर्वतराज जयद्रथ, गांधारराज शकुनि, पूर्व और उत्तरदेश के राजा, शक, किरात, यवन, शिबि और वसति - ये सभी महारथी अपनी-अपनी सेनाओं के साथ महारथी (भीष्म) को चारों ओर से घेरकर सुसज्जित होकर दूसरे सेना समूह के रूप में निकल पड़े ॥6-8॥
 
श्लोक 9-10:  कृतवर्मा अपनी सेना के साथ, महाराज त्रिगर्त, राजा दुर्योधन अपने भाइयों से घिरे हुए, शाल, भूरिश्रवा, शल्य और कोसल राजा बृहद्रथ - उन्होंने दुर्योधन का नेतृत्व किया और उसका पीछा किया (तीसरे सेना समूह में)। 9-10॥
 
श्लोक 11:  वे महाबली धृतराष्ट्रपुत्र कवच आदि से सुसज्जित होकर युद्धभूमि में गए और कुरुक्षेत्र के पश्चिम भाग में यथायोग्य खड़े हो गए॥11॥
 
श्लोक 12-13:  भरत! दुर्योधन ने पहले ही एक निवासस्थान बनवा लिया था, जो दूसरे हस्तिनापुर के समान सुसज्जित था। राजेन्द्र! नगर में रहने वाले चतुर लोग भी उस शिविर और हस्तिनापुर नामक नगर का अन्तर समझने में असमर्थ थे। 12-13।
 
श्लोक 14:  अन्य राजाओं के लिए भी कुरुवंश के राजा भूपाल ने सैकड़ों-हजारों ऐसे ही दुर्ग बनवाए थे ॥14॥
 
श्लोक 15:  युद्धभूमि के लिए पाँच योजन की परिधि छोड़कर, सैनिकों के ठहरने के लिए सैकड़ों की संख्या में अनेक शिविर लगाए गए थे ॥ 15॥
 
श्लोक 16:  उन बहुमूल्य आवश्यक सामग्रियों से सुसज्जित उन हजारों शिविरों में राजा अपनी शक्ति और उत्साह के अनुसार युद्ध के लिए तैयार रहते थे।
 
श्लोक 17-18:  राजा दुर्योधन उन महामनस्वी राजाओं को उनके सवारों और सैनिकों सहित उत्तम-उत्तम भोजन प्रदान करता था। हाथी, घोड़े, पैदल, शिल्पी, अन्य अनुचर, सूत, मागध और बंदी भी राजा के हाथ से भोजन प्राप्त करते थे।॥17-18॥
 
श्लोक 19:  कुरुराज दुर्योधन वहाँ आने वाले समस्त वणिकों, गणिकाओं, गुप्तचरों और दर्शकों का उचित ध्यान रखता था ॥19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)