क्रोधाद् यं पुरुषं पश्येस्तथा शक्रसमद्युते।
स क्षिप्रं न भवेद् व्यक्तमिति त्वां वेद्मि कौरव॥ २२॥
अनुवाद
हे इन्द्र के समान तेजस्वी कुरुपुत्र! जिस किसी मनुष्य को तुम क्रोध से देखोगे, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाएगा। मैं तुम्हारा यह पराक्रम जानता हूँ।॥22॥
O son of Kuru, who is as radiant as Indra! Any man whom you look at with anger will soon be destroyed. I know this power of yours.'॥ 22॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि अर्जुनवाक्ये चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १९४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें अर्जुनवाक्यविषयक एक सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९४॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)