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श्लोक 5.192.70  |
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा तु कौरव्यो राजा दुर्योधनस्तदा।
मुहूर्तमिव स ध्यात्वा भीष्मे युक्तममन्यत॥ ७०॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! यह सब सुनकर कुरुवंशी राजा दुर्योधन ने कुछ देर तक विचार किया और फिर निश्चय किया कि शिखण्डी को न मारना ही भीष्म के लिए अच्छा होगा। |
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| Vaishmpayana says - Janamejaya! After listening to all this, the Kuru dynasty king Duryodhana thought over it for a while and then decided that it would be better for Bhishma not to kill Shikhandi. 70. |
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इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि शिखण्डिपुंस्त्वप्राप्तौ द्विनवत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १९२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें शिखण्डीको पुरुषत्व-प्राप्तिविषयक एक सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९२॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ७० १/२ श्लोक हैं।] |
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