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mahabharat 5.192.60: महाराज! कुरुश्रेष्ठ! द्रुपद ने अपने पुत्र शिखण्डी को, जो पहले कन्या रूप में उत्पन्न हुआ था, धनुर्वेद की शिक्षा के लिए द्रोणाचार्य की सेवा में सौंप दिया था ॥60॥   |   mahabharat अध्याय 5.192: शिखण्डीको पुरुषत्वकी प्राप्ति, द्रुपद और हिरण्यवर्माकी प्रसन्नता, स्थूणाकर्णको कुबेरका शाप तथा भीष्मका शिखण्डीको न मारनेका निश्चय   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 192: शिखण्डीको पुरुषत्वकी प्राप्ति, द्रुपद और हिरण्यवर्माकी प्रसन्नता, स्थूणाकर्णको कुबेरका शाप तथा भीष्मका शिखण्डीको न मारनेका निश्चय  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  5.192.60 
शिष्यार्थं प्रददौ चाथ द्रोणाय कुरुपुङ्गव।
शिखण्डिनं महाराज पुत्रं स्त्रीपूर्विणं तथा॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
महाराज! कुरुश्रेष्ठ! द्रुपद ने अपने पुत्र शिखण्डी को, जो पहले कन्या रूप में उत्पन्न हुआ था, धनुर्वेद की शिक्षा के लिए द्रोणाचार्य की सेवा में सौंप दिया था ॥60॥
 
Maharaj! Kurushrestha! Drupada handed over his son Shikhandi, who was first born as a girl, to the service of Dronacharya for the education of Dhanurveda. 60॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)