श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 192: शिखण्डीको पुरुषत्वकी प्राप्ति, द्रुपद और हिरण्यवर्माकी प्रसन्नता, स्थूणाकर्णको कुबेरका शाप तथा भीष्मका शिखण्डीको न मारनेका निश्चय  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  5.192.55 
यक्ष उवाच
शप्तो वैश्रवणेनाहं त्वत्कृते पार्थिवात्मज।
गच्छेदानीं यथाकामं चर लोकान् यथासुखम्॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
यक्ष ने कहा, "राजन्! आपके ही कारण यक्षराज ने मुझे शाप दिया है; अतः अब आप जाकर संसार में अपनी इच्छानुसार भ्रमण करें।"
 
The Yaksha said, "Prince! It is for your sake that the Yaksha king has cursed me; so now go and roam around the world as you please." 55
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)