श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 192: शिखण्डीको पुरुषत्वकी प्राप्ति, द्रुपद और हिरण्यवर्माकी प्रसन्नता, स्थूणाकर्णको कुबेरका शाप तथा भीष्मका शिखण्डीको न मारनेका निश्चय  »  श्लोक 46-47
 
 
श्लोक  5.192.46-47 
ततोऽब्रवीद् यक्षपतिर्महात्मा
यस्माददास्त्ववमन्येह यक्षान्।
शिखण्डिने लक्षणं पापबुद्धे
स्त्रीलक्षणं चाग्रही: पापकर्मन्॥ ४६॥
अप्रवृत्तं सुदुर्बुद्धे यस्मादेतत् त्वया कृतम्।
तस्मादद्य प्रभृत्येव स्त्री त्वं सा पुरुषस्तथा॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् महात्मा यक्षराज ने उस यक्ष से कहा - 'पापी एवं पापी यक्ष! तूने यक्षों का अनादर करके यहाँ शिखण्डी को अपना पुरुषत्व देकर उसका स्त्रीत्व स्वीकार कर लिया है। मूर्ख! तूने जो अव्यवहारिक कृत्य किया है, उसके कारण आज से तू स्त्रीरूप में रहेगा और शिखण्डी पुरुषरूप में रहेगा।' 46-47॥
 
Thereafter Mahatma Yaksharaj said to that Yaksha - 'Sinful and sinful Yaksha! By disrespecting the Yakshas, ​​you have given your manhood to Shikhandi here and have accepted her womanhood. Stupid! Because of the impractical act that you have done, from today you will remain a woman and Shikhandi will remain in the form of a man. 46-47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)