श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 192: शिखण्डीको पुरुषत्वकी प्राप्ति, द्रुपद और हिरण्यवर्माकी प्रसन्नता, स्थूणाकर्णको कुबेरका शाप तथा भीष्मका शिखण्डीको न मारनेका निश्चय  »  श्लोक 1-3
 
 
श्लोक  5.192.1-3 
भीष्म उवाच
शिखण्डिवाक्यं श्रुत्वाथ स यक्षो भरतर्षभ।
प्रोवाच मनसा चिन्त्य दैवेनोपनिपीडित:॥ १॥
भवितव्यं तथा तद्धि मम दु:खाय कौरव।
भद्रे कामं करिष्यामि समयं तु निबोध मे॥ २॥
(स्वं ते पुंस्त्वं प्रदास्यामि स्त्रीत्वं धारयितास्मि ते।)
किंचित् कालान्तरे दास्ये पुँल्लिङ्गं स्वमिदं तव।
आगन्तव्यं त्वया काले सत्यं चैव वदस्व मे॥ ३॥
 
 
अनुवाद
भीष्म कहते हैं - हे भरतश्रेष्ठ कौरव! शिखण्डिनी की यह बात सुनकर देवताओं से पीड़ित यक्ष ने कुछ विचार करके कहा - 'भद्र! तुम जो कहोगे, वह तो होगा; किन्तु उससे मुझे दुःख होगा, फिर भी मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा। इस विषय में मेरी शर्त सुनो। मैं तुम्हें अपना पुरुषत्व देता हूँ और तुम्हारा स्त्रीत्व स्वयं ले लूँगा; किन्तु मैं तुम्हें अपना यह पुरुषत्व थोड़े समय के लिए ही दूँगा। उस निश्चित समय के भीतर तुम यहाँ आकर मेरा पुरुषत्व लौटा दो। इसके लिए मुझे एक सच्चा वचन दो।॥1-3॥
 
Bhishma says - O best of the Kauravas of Bharata! Hearing this from Shikhandini, the god-afflicted Yaksha thought a little and said - 'Bhadra! What you say will happen; but it will cause me grief, yet I will fulfill your wish. Listen to my condition in this matter. I will give you my manhood and I will take your womanhood myself; but I will give you this manhood of mine only for a short time. Within that fixed time, you should come here to return my manhood. For this, give me a true promise.॥1-3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)