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श्लोक  5.190.1 
भीष्म उवाच
एवमुक्तस्य दूतेन द्रुपदस्य तदा नृप।
चोरस्येव गृहीतस्य न प्रावर्तत भारती॥ १॥
 
 
अनुवाद
भीष्म कहते हैं - हे राजन! दूत के ऐसा कहने पर पकड़े हुए चोर के समान राजा द्रुपद सहसा मुँह से कुछ भी नहीं बोले।
 
Bhishma says - O King! When the messenger said this, like a thief who has been caught, King Drupada suddenly did not utter a word.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)