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श्लोक 5.189.17  |
शिखण्डॺपि महाराज पुंवद् राजकुले तदा।
विजहार मुदा युक्त: स्त्रीत्वं नैवातिरोचयन्॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| महाराज! शिखण्डी भी उस राजकुल में पुरुष की भाँति सुखपूर्वक विचरण करता था। उसे अपना स्त्रीत्व अच्छा नहीं लगता था॥17॥ |
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| Maharaj! Shikhandi also used to roam around happily like a man in that royal family. He did not like his womanhood.॥ 17॥ |
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