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श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 186: अम्बाकी कठोर तपस्या  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  5.186.34 
ततोऽब्रवीत् सागरगा जिह्मं चरसि भाविनि।
नैष कामोऽनवद्याङ्गि शक्य: प्राप्तुं त्वयाबले॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
तब समुद्रगामी गंगा ने उससे कहा- 'भाविनी! तुम कुटिलता से आचरण कर रही हो। हे सुन्दर अंगों वाली असहाय कन्या! तुम्हारी यह इच्छा कभी पूरी नहीं हो सकती।'
 
Then the river Ganga, the sea-goer, said to her- 'Bhavini! You are behaving crookedly. O helpless girl with beautiful body parts! This desire of yours can never be fulfilled.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)