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mahabharat 5.185.4: परशुरामजी तपस्वी, ब्राह्मणभक्त, ब्रह्मवेत्ता और तुम्हारे गुरु हैं। हे कुरुकुलरत्न! तुम उनका किसी प्रकार अपमान न करो।॥4॥   |   mahabharat अध्याय 5.185: देवताओंके मना करनेसे भीष्मका प्रस्वापनास्त्रको प्रयोगमें न लाना तथा पितर, देवता और गंगाके आग्रहसे भीष्म और परशुरामके युद्धकी समाप्ति   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 185: देवताओंके मना करनेसे भीष्मका प्रस्वापनास्त्रको प्रयोगमें न लाना तथा पितर, देवता और गंगाके आग्रहसे भीष्म और परशुरामके युद्धकी समाप्ति  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.185.4 
रामस्तपस्वी ब्रह्मण्यो ब्राह्मणश्च गुरुश्च ते।
तस्यावमानं कौरव्य मा स्म कार्षी: कथंचन॥ ४॥
 
 
अनुवाद
परशुरामजी तपस्वी, ब्राह्मणभक्त, ब्रह्मवेत्ता और तुम्हारे गुरु हैं। हे कुरुकुलरत्न! तुम उनका किसी प्रकार अपमान न करो।॥4॥
 
Parashuramji is an ascetic, a devotee of Brahmins, a Brahman who knows Brahman and is your Guru. O jewel of the Kurukul! Do not insult him in any way.'॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)