Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 5.185.25-27h: तब मैंने क्षत्रिय धर्म को ध्यान में रखते हुए उनसे कहा - 'महर्षिओ! संसार में मेरी यह सुप्रसिद्ध प्रतिज्ञा है कि पीठ पर बाणों की चोट लगते समय मैं युद्ध से कभी निवृत्त नहीं हो सकता। मेरा यह दृढ़ मत है कि मैं लोभ, कायरता, दरिद्रता, भय अथवा किसी स्वार्थवश भी क्षत्रियों के सनातन धर्म का परित्याग नहीं कर सकता।'॥25-26 1/2॥ | mahabharat अध्याय 5.185: देवताओंके मना करनेसे भीष्मका प्रस्वापनास्त्रको प्रयोगमें न लाना तथा पितर, देवता और गंगाके आग्रहसे भीष्म और परशुरामके युद्धकी समाप्ति । mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
तब मैंने क्षत्रिय धर्म को ध्यान में रखते हुए उनसे कहा - 'महर्षिओ! संसार में मेरी यह सुप्रसिद्ध प्रतिज्ञा है कि पीठ पर बाणों की चोट लगते समय मैं युद्ध से कभी निवृत्त नहीं हो सकता। मेरा यह दृढ़ मत है कि मैं लोभ, कायरता, दरिद्रता, भय अथवा किसी स्वार्थवश भी क्षत्रियों के सनातन धर्म का परित्याग नहीं कर सकता।'॥25-26 1/2॥
Then I said to them, keeping the Kshatriya Dharma in mind - 'Maharishis! It is a well-known vow of mine in the world that I can never retire from a war while being hit by arrows on my back. I am of the firm opinion that I cannot abandon the eternal Dharma of the Kshatriyas even out of greed, cowardice or poverty, fear or any selfish motive.'॥ 25-26 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥