श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 185: देवताओंके मना करनेसे भीष्मका प्रस्वापनास्त्रको प्रयोगमें न लाना तथा पितर, देवता और गंगाके आग्रहसे भीष्म और परशुरामके युद्धकी समाप्ति  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.185.2 
अयुञ्जमेव चैवाहं तदस्त्रं भृगुनन्दने।
प्रस्वापं मां प्रयुञ्जानं नारदो वाक्यमब्रवीत्॥ २॥
 
 
अनुवाद
फिर भी मैंने भृगुनंदन परशुरामजी को लक्ष्य करके उस अस्त्र को अपने धनुष पर चढ़ा लिया। मुझे प्रस्वपनास्त्र चलाते देख नारदजी ने इस प्रकार कहा -॥2॥
 
However, I aimed at Bhrigunandan Parshuramji and mounted that weapon on my bow. Seeing me using Prasvapanastra, Naradji said thus -॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)