ततो हाहाकृते लोके सदेवासुरराक्षसे।
इदमन्तरमित्येवं मोक्तुकामोऽस्मि भारत॥ २२॥
प्रस्वापमस्त्रं त्वरितो वचनाद् ब्रह्मवादिनाम्।
विचित्रं च तदस्त्रं मे मनसि प्रत्यभात् तदा॥ २३॥
अनुवाद
तत्पश्चात् देवता, दानव और राक्षसों सहित सम्पूर्ण जगत में हाहाकार मच गया। हे भारत! मैंने उचित समय समझकर तुरन्त प्रस्वप्नास्त्र छोड़ने का विचार किया। तब उन ब्रह्मवादी वसुओं के कथनानुसार मुझे उस विचित्र अस्त्र का स्मरण हुआ।
Thereafter, the entire world including the gods, demons and monsters was in uproar. Bhaarat! Thinking that this is the right time, I immediately thought of releasing the Prasvapnaastra. Then, as per the words of those Brahmavaadi Vasus, I remembered that strange weapon.
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि परस्परब्रह्मास्त्रप्रयोगे चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १८४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें परस्पर ब्रह्मास्त्रयोगविषयक एक सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८४॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)