श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 183: भीष्मको अष्टवसुओंसे प्रस्वापनास्त्रकी प्राप्ति  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  5.183.1-2 
भीष्म उवाच
ततोऽहं निशि राजेन्द्र प्रणम्य शिरसा तदा।
ब्राह्मणानां पितॄणां च देवतानां च सर्वश:॥ १॥
नक्तंचराणां भूतानां राजन्यानां विशाम्पते।
शयनं प्राप्य रहिते मनसा समचिन्तयम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं- राजेन्द्र! तत्पश्चात मैं रात्रि में एकान्त में शयन करने चला गया और ब्राह्मणों, पितरों, देवताओं, निशाचरों, भूतों और राजर्षियों को सिर नवाकर मन में इस प्रकार विचार करने लगा॥1-2॥
 
Bhishmaji says- Rajendra! Thereafter, I went to bed alone at night and after bowing my head to the Brahmins, ancestors, gods, nocturnal spirits, ghosts and royal sages, I started thinking in my mind like this. 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)