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mahabharat 5.18.13-14: शत्रुसूदन! जैसे अगस्त्य के शाप से दुष्ट, ब्रह्मद्वेषी और पापी नहुष अनंत वर्षों तक नष्ट हो गया, उसी प्रकार कर्ण और दुर्योधन आदि आपके दुष्टचित्त शत्रु भी शीघ्र ही विनाश को प्राप्त हो जाएँगे॥13-14॥   |   mahabharat अध्याय 5.18: इन्द्रका स्वर्गमें जाकर अपने राज्यका पालन करना, शल्यका युधिष्ठिरको आश्वासन देना और उनसे विदा लेकर दुर्योधनके यहाँ जाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 18: इन्द्रका स्वर्गमें जाकर अपने राज्यका पालन करना, शल्यका युधिष्ठिरको आश्वासन देना और उनसे विदा लेकर दुर्योधनके यहाँ जाना  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  5.18.13-14 
दुराचारश्च नहुषो ब्रह्मद्विट् पापचेतन:।
अगस्त्यशापाभिहतो विनष्ट: शाश्वती: समा:॥ १३॥
एवं तव दुरात्मान: शत्रव: शत्रुसूदन।
क्षिप्रं नाशं गमिष्यन्ति कर्णदुर्योधनादय:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
शत्रुसूदन! जैसे अगस्त्य के शाप से दुष्ट, ब्रह्मद्वेषी और पापी नहुष अनंत वर्षों तक नष्ट हो गया, उसी प्रकार कर्ण और दुर्योधन आदि आपके दुष्टचित्त शत्रु भी शीघ्र ही विनाश को प्राप्त हो जाएँगे॥13-14॥
 
Shatrusudan! Just as the wicked, brahmin-hater and sinful Nahush was destroyed for infinite years due to the curse of Agastya, similarly your evil-minded enemies like Karna and Duryodhan etc. will soon go to their destruction. ॥ 13-14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)