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mahabharat 5.179.12-13: जब उन्होंने मुझ पर तीन बार बाणों से आक्रमण किया, तब मैंने घोड़ों को रोक दिया, धनुष नीचे रख दिया और रथ से उतरकर उन महाब्राह्मण ऋषि परशुरामजी को प्रणाम करने के लिए पैदल ही चल दिया। वहाँ जाकर उन्हें विधिपूर्वक प्रणाम करके मैंने ये उत्तम वचन कहे -॥12-13॥   |   mahabharat अध्याय 5.179: संकल्पनिर्मित रथपर आरूढ़ परशुरामजीके साथ भीष्मका युद्ध प्रारम्भ करना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 179: संकल्पनिर्मित रथपर आरूढ़ परशुरामजीके साथ भीष्मका युद्ध प्रारम्भ करना  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  5.179.12-13 
ततोऽहं बाणपातेषु त्रिषु वाहान् निगृह्य वै।
अवतीर्य धनुर्न्यस्य पदातिर्ऋषिसत्तमम्॥ १२॥
अभ्यागच्छं तदा राममर्चिष्यन् द्विजसत्तमम्।
अभिवाद्य चैनं विधिवदब्रुवं वाक्यमुत्तमम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
जब उन्होंने मुझ पर तीन बार बाणों से आक्रमण किया, तब मैंने घोड़ों को रोक दिया, धनुष नीचे रख दिया और रथ से उतरकर उन महाब्राह्मण ऋषि परशुरामजी को प्रणाम करने के लिए पैदल ही चल दिया। वहाँ जाकर उन्हें विधिपूर्वक प्रणाम करके मैंने ये उत्तम वचन कहे -॥12-13॥
 
When he had attacked me with arrows thrice, I stopped the horses, put down my bow and got down from the chariot and went on foot to pay my respects to that great Brahmin sage Parashurama. After going and paying my respects to him in a proper manner, I spoke these excellent words -॥12-13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)