श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 178: अम्बा और परशुरामजीका संवाद, अकृतव्रणकी सलाह, परशुराम और भीष्मकी रोषपूर्ण बातचीत तथा उन दोनोंका युद्धके लिये कुरुक्षेत्रमें उतरना  »  श्लोक 94
 
 
श्लोक  5.178.94 
वैशम्पायन उवाच
ततो गङ्गा सुतस्नेहाद् भीष्मं पुनरुपागमत्।
न चास्याश्चाकरोद् वाक्यं क्रोधपर्याकुलेक्षण:॥ ९४॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! तब गंगादेवी अपने पुत्र-प्रेम से पुनः भीष्म के पास आईं। उस समय भीष्म के नेत्र क्रोध से भरे हुए थे; इसलिए उन्होंने भी अपनी माता की बात नहीं मानी॥94॥
 
Vaishmpayana says- Janamejaya! Then Gangadevi came to Bhishma again out of love for her son. At that time Bhishma's eyes were filled with anger; therefore he too did not listen to his mother.॥ 94॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)