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श्री महाभारत
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पर्व 5: उद्योग पर्व
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अध्याय 178: अम्बा और परशुरामजीका संवाद, अकृतव्रणकी सलाह, परशुराम और भीष्मकी रोषपूर्ण बातचीत तथा उन दोनोंका युद्धके लिये कुरुक्षेत्रमें उतरना
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श्लोक 53
श्लोक
5.178.53
यो यथा वर्तते यस्मिंस्तस्मिन्नेव प्रवर्तयन्।
नाधर्मं समवाप्नोति न चाश्रेयश्च विन्दति॥ ५३॥
अनुवाद
जो मनुष्य दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करता है जैसा वे उसके साथ करते हैं, वह न तो कोई पाप करता है और न ही किसी दुर्भाग्य का भागी होता है॥ 53॥
A man who treats others in the same way as they treat him neither commits any sin nor is he a part of any misfortune.॥ 53॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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