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mahabharat 5.178.40-41: तब क्रोध से लाल नेत्रों वाले परशुरामजी मुझसे बोले - 'हे भीष्म! आप मुझे अपना गुरु मानते हैं; किन्तु मुझे प्रसन्न करने के लिए आप काशीराज की इस कन्या को स्वीकार नहीं कर रहे हैं; किन्तु हे कुरुपुत्र! ऐसा किए बिना आपको शांति नहीं मिल सकती। ॥40-41॥   |   mahabharat अध्याय 5.178: अम्बा और परशुरामजीका संवाद, अकृतव्रणकी सलाह, परशुराम और भीष्मकी रोषपूर्ण बातचीत तथा उन दोनोंका युद्धके लिये कुरुक्षेत्रमें उतरना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 178: अम्बा और परशुरामजीका संवाद, अकृतव्रणकी सलाह, परशुराम और भीष्मकी रोषपूर्ण बातचीत तथा उन दोनोंका युद्धके लिये कुरुक्षेत्रमें उतरना  »  श्लोक 40-41
 
 
श्लोक  5.178.40-41 
ततो मामब्रवीद् राम: क्रोधसंरक्तलोचन:।
जानीषे मां गुरुं भीष्म गृह्णासीमां न चैव ह॥ ४०॥
सुतां काश्यस्य कौरव्य मत्प्रियार्थं महामते।
न हि ते विद्यते शान्तिरन्यथा कुरुनन्दन॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
तब क्रोध से लाल नेत्रों वाले परशुरामजी मुझसे बोले - 'हे भीष्म! आप मुझे अपना गुरु मानते हैं; किन्तु मुझे प्रसन्न करने के लिए आप काशीराज की इस कन्या को स्वीकार नहीं कर रहे हैं; किन्तु हे कुरुपुत्र! ऐसा किए बिना आपको शांति नहीं मिल सकती। ॥40-41॥
 
Then Parasurama, with his eyes turning red with anger, said to me- 'O great Bhishma! You consider me your Guru; but to please me, you are not accepting this daughter of the King of Kashi; but O son of Kuru! Without doing so, you cannot find peace. ॥ 40-41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)