श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 178: अम्बा और परशुरामजीका संवाद, अकृतव्रणकी सलाह, परशुराम और भीष्मकी रोषपूर्ण बातचीत तथा उन दोनोंका युद्धके लिये कुरुक्षेत्रमें उतरना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  5.178.34 
न भयान्नाप्यनुक्रोशान्नार्थलोभान्न काम्यया।
क्षात्रं धर्ममहं जह्यामिति मे व्रतमाहितम्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
मैं भय, दया, धन के लोभ या किसी अन्य कामना से क्षत्रिय धर्म का परित्याग नहीं कर सकता। यह मेरा स्वीकृत व्रत है।॥ 34॥
 
I cannot abandon the duty of a Kshatriya out of fear, pity, greed for money or any other desire. This is a vow accepted by me.'॥ 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)