श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 177: अकृतव्रण और परशुरामजीकी अम्बासे बातचीत  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  5.177.28-29 
भीष्म उवाच
तस्याश्च दृष्ट्वा रूपं च वपुश्चाभिनवं पुन:।
सौकुमार्यं परं चैव रामश्चिन्तापरोऽभवत्॥ २८॥
किमियं वक्ष्यतीत्येवं विममर्श भृगूद्वह:।
इति दध्यौ चिरं राम: कृपयाभिपरिप्लुत:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
भीष्म कहते हैं - हे राजन! उसके सुन्दर रूप, नवीन (युवा) शरीर और कोमलता को देखकर परशुरामजी चिंतित हो गए कि वह क्या कहेगी। उस पर दया से भरकर भृगुवंशी रत्न परशुरामजी बहुत समय तक उसकी चिन्ता करते रहे।
 
Bhishma says - O King! Seeing her beautiful form, her new (young) body and her tenderness, Parashurama became worried as to what she would say. Filled with compassion for her, Parashurama, the jewel of the Bhrigu clan, kept worrying about her for a long time. 28-29.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)