श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 176: तापसोंके आश्रममें राजर्षि होत्रवाहन और अकृतव्रणका आगमन तथा उनसे अम्बाकी बातचीत  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  5.176.58 
न ह्युत्सहे स्वनगरं प्रतियातुं तपोधन।
अपमानभयाच्चैव व्रीडया च महामुने॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
तपोधन! महामुने! लज्जा और अपमान के भय से मुझमें अपने नगर जाने का उत्साह नहीं है।
 
Tapodhan! Mahamune! Due to fear of shame and insult, I do not have the enthusiasm to go to my city.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)