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mahabharat 5.176.51: हे धर्म के ज्ञाता! मैंने मन ही मन वीर शाल्वराज को पति के रूप में वरण कर लिया है; अतः मेरा मन अन्यत्र आसक्त होने के कारण आप मुझे अपने भाई के साथ विवाह न कराएं।'   |   mahabharat अध्याय 5.176: तापसोंके आश्रममें राजर्षि होत्रवाहन और अकृतव्रणका आगमन तथा उनसे अम्बाकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.176.51 
मया शाल्वपतिर्वीरो मनसाभिवृत: पति:।
न मामर्हसि धर्मज्ञ दातुं भ्रात्रेऽन्यमानसाम्॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
हे धर्म के ज्ञाता! मैंने मन ही मन वीर शाल्वराज को पति के रूप में वरण कर लिया है; अतः मेरा मन अन्यत्र आसक्त होने के कारण आप मुझे अपने भाई के साथ विवाह न कराएं।'
 
O knower of Dharma! I have in my heart chosen the brave Shalvaraj as my husband; therefore, as my mind is attached elsewhere, you should not marry me to your brother.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)