श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 176: तापसोंके आश्रममें राजर्षि होत्रवाहन और अकृतव्रणका आगमन तथा उनसे अम्बाकी बातचीत  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  5.176.41 
अकृतव्रण उवाच
भवन्तमेव सततं राम: कीर्तयति प्रभो।
सृञ्जयो मे प्रियसखो राजर्षिरिति पार्थिव॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
अकृतव्रण ने कहा- हे राजन! परशुराम सदैव आपकी चर्चा करते रहते हैं। वे कहते हैं कि सृंजयवंशी राजर्षि होत्रवाहन मेरे प्रिय मित्र हैं।
 
Akritavrana said- O King! Parasurama always talks about you. He says that Rajarshi Hotravahan of the Srunjay dynasty is my dear friend. 41.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)