श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 176: तापसोंके आश्रममें राजर्षि होत्रवाहन और अकृतव्रणका आगमन तथा उनसे अम्बाकी बातचीत  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  5.176.32 
तत्र गच्छस्व भद्रं ते ब्रूयाश्चैनं वचो मम।
अभिवाद्य च तं मूर्ध्ना तपोवृद्धं दृढव्रतम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
पुत्री! तुम्हारा कल्याण हो। वहाँ जाकर उन दृढ़ तपस्वी मुनि को नमस्कार करो और पहले उनसे मेरा सन्देश कहो ॥32॥
 
Daughter! May you be blessed. Go there and greet that steadfast ascetic sage and first tell him my message. ॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)