श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 176: तापसोंके आश्रममें राजर्षि होत्रवाहन और अकृतव्रणका आगमन तथा उनसे अम्बाकी बातचीत  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  5.176.30 
होत्रवाहन उवाच
रामं द्रक्ष्यसि भद्रे त्वं जामदग्न्यं महावने।
उग्रे तपसि वर्तन्तं सत्यसंधं महाबलम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
होत्रवाहन बोले—हे प्रिये! जमदग्निपुत्र परशुराम महान वन में घोर तपस्या कर रहे हैं। वे अत्यन्त बलवान और सत्यनिष्ठ हैं। तुम अवश्य ही उनका दर्शन करोगे॥30॥
 
Hotravahan said—O dear! Jamadagni's son Parashurama is performing severe penance in a great forest. He is very powerful and truthful. You will certainly get to see him.॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)