श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 176: तापसोंके आश्रममें राजर्षि होत्रवाहन और अकृतव्रणका आगमन तथा उनसे अम्बाकी बातचीत  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  5.176.22 
तत: स राजर्षिरभूद् दु:खशोकसमन्वित:।
कार्यं च प्रतिपेदे तन्मनसा सुमहातपा:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
तब उस महान तपस्वी राजा ने शोक और शोक से पीड़ित होकर मन में आवश्यक कर्तव्य का निश्चय किया ॥22॥
 
Then that great ascetic king, tormented by grief and sorrow, decided in his mind about the necessary duty. ॥22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)