Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 5.176.13: हे तपस्वियों! मैं बचपन में अपने पिता के घर में रही हूँ। आप सबका कल्याण हो। अब मैं अपने पिता के यहाँ नहीं जाऊँगी। मैं तो केवल आप तपस्वियों द्वारा संरक्षित होकर यहीं तपस्या करना चाहती हूँ॥13॥ | mahabharat अध्याय 5.176: तापसोंके आश्रममें राजर्षि होत्रवाहन और अकृतव्रणका आगमन तथा उनसे अम्बाकी बातचीत । mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
उषितास्मि तथा बाल्ये पितुर्वेश्मनि तापसा:।
नाहं गमिष्ये भद्रं वस्तत्र यत्र पिता मम।
तपस्तप्तुमभीप्सामि तापसै: परिरक्षिता॥ १३॥
अनुवाद
हे तपस्वियों! मैं बचपन में अपने पिता के घर में रही हूँ। आप सबका कल्याण हो। अब मैं अपने पिता के यहाँ नहीं जाऊँगी। मैं तो केवल आप तपस्वियों द्वारा संरक्षित होकर यहीं तपस्या करना चाहती हूँ॥13॥
O ascetics! I have lived in my father's house in my childhood. May you be blessed. Now I will not go where my father is. I only wish to perform penance here, protected by you ascetics.॥ 13॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥