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mahabharat 5.175.44: हे निष्पाप तपस्वियों! मैं चाहता हूँ कि आप देवतातुल्य मुनिगण मुझे तप का मार्ग बताएँ, आप सब मुझ पर कृपा करें॥ 44॥   |   mahabharat अध्याय 5.175: अम्बाका शाल्वके यहाँ जाना और उससे परित्यक्त होकर तापसोंके आश्रममें आना, वहाँ शैखावत्य और अम्बाका संवाद   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 175: अम्बाका शाल्वके यहाँ जाना और उससे परित्यक्त होकर तापसोंके आश्रममें आना, वहाँ शैखावत्य और अम्बाका संवाद  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  5.175.44 
उपदिष्टमिहेच्छामि तापस्यं वीतकल्मषा:।
युष्माभिर्देवसंकाशै: कृपा भवतु वो मयि॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
हे निष्पाप तपस्वियों! मैं चाहता हूँ कि आप देवतातुल्य मुनिगण मुझे तप का मार्ग बताएँ, आप सब मुझ पर कृपा करें॥ 44॥
 
O sinless ascetics! I want that you saints who are like gods should preach me the path of penance, may you all have mercy on me.'॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)