vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 5: उद्योग पर्व
»
अध्याय 175: अम्बाका शाल्वके यहाँ जाना और उससे परित्यक्त होकर तापसोंके आश्रममें आना, वहाँ शैखावत्य और अम्बाका संवाद
»
श्लोक 44
श्लोक
5.175.44
उपदिष्टमिहेच्छामि तापस्यं वीतकल्मषा:।
युष्माभिर्देवसंकाशै: कृपा भवतु वो मयि॥ ४४॥
अनुवाद
हे निष्पाप तपस्वियों! मैं चाहता हूँ कि आप देवतातुल्य मुनिगण मुझे तप का मार्ग बताएँ, आप सब मुझ पर कृपा करें॥ 44॥
O sinless ascetics! I want that you saints who are like gods should preach me the path of penance, may you all have mercy on me.'॥ 44॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×