श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 175: अम्बाका शाल्वके यहाँ जाना और उससे परित्यक्त होकर तापसोंके आश्रममें आना, वहाँ शैखावत्य और अम्बाका संवाद  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  5.175.32 
धिङ्मां धिक् शाल्वराजानं धिग् धातारमथापि वा।
येषां दुर्नीतभावेन प्राप्तास्म्यापदमुत्तमाम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
मुझे धिक्कार है, शाल्वराज को धिक्कार है और उस विधाता को भी धिक्कार है, जिसकी दुष्ट नीति के कारण मैं इस महान विपत्ति में फँस गया हूँ॥ 32॥
 
Shame on me, shame on Shalvaraj and shame on the creator too, because of whose evil policies I have been trapped in this great calamity.॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)