श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 173: अम्बोपाख्यानका आरम्भ—भीष्मजीके द्वारा काशिराजकी कन्याओंका अपहरण  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  5.173.7 
मयाभिषिक्तो राजेन्द्र यवीयानपि धर्मत:।
विचित्रवीर्यो धर्मात्मा मामेव समुदैक्षत॥ ७॥
 
 
अनुवाद
राजन! पुण्यात्मा विचित्रवीर्य मुझसे छोटे होने पर भी मुझसे अभिषिक्त होकर अपने कर्तव्यानुसार मेरी ओर ही देखते थे, अर्थात् मेरी आज्ञा से ही समस्त राजकार्य करते थे।
 
King! Even though he was younger than me, the virtuous Vichitravirya, having been anointed by me, used to look towards me as per his duty, i.e., he used to do all the royal affairs with my consent only.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas