श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 17: अगस्त्यजीका इन्द्रसे नहुषके पतनका वृत्तान्त बताना  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  5.17.9-10 
पप्रच्छुर्नहुषं देव संशयं जयतां वर।
य इमे ब्रह्मणा प्रोक्ता मन्त्रा वै प्रोक्षणे गवाम्॥ ९॥
एते प्रमाणं भवत उताहो नेति वासव।
नहुषो नेति तानाह तमसा मूढचेतन:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
हे विजयी योद्धाओं में श्रेष्ठ इन्द्र! उस समय उन महर्षियों ने नहुष से एक शंका पूछी—‘देवेन्द्र! क्या तुम वेदों में वर्णित गौ-रक्षा के मन्त्रों को प्रामाणिक मानते हो या नहीं?’ अंधकार से युक्त अज्ञान के कारण नहुष का मन भ्रमित हो गया था। उसने महर्षियों को उत्तर दिया—‘मैं इन वैदिक मन्त्रों को प्रामाणिक नहीं मानता।’॥9-10॥
 
O Indra, the best among victorious warriors! At that time those great sages asked Nahush a doubt—'Devendra! Do you consider the mantras mentioned in the Vedas regarding the protection of cows to be authentic or not?' Nahush's mind was confused due to ignorance filled with darkness. He replied to the great sages—'I do not consider these Vedic mantras to be authentic.'॥ 9-10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)