श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 17: अगस्त्यजीका इन्द्रसे नहुषके पतनका वृत्तान्त बताना  »  श्लोक 20-21
 
 
श्लोक  5.17.20-21 
शल्य उवाच
ततो देवा भृशं तुष्टा महर्षिगणसंवृता:।
पितरश्चैव यक्षाश्च भुजगा राक्षसास्तथा॥ २०॥
गन्धर्वा देवकन्याश्च सर्वे चाप्सरसां गणा:।
सरांसि सरित: शैला: सागराश्च विशाम्पते॥ २१॥
 
 
अनुवाद
शल्य कहते हैं- युधिष्ठिर! तत्पश्चात देवता, पितर, यक्ष, नाग, राक्षस, गन्धर्व, देवकन्याएँ और समस्त अप्सराएँ, महर्षियों से घिरे हुए, अत्यन्त प्रसन्न हुए। नदियाँ, सरोवर, शिलाएँ और समुद्र भी अत्यन्त संतुष्ट हुए। 20-21॥
 
Shalya says- Yudhishthir! Thereafter, the Gods, ancestors, Yakshas, ​​Nagas, Rakshasas, Gandharvas, Devkanyas and all the Apsaras, surrounded by the great sages, became very happy. The rivers, lakes, rocks and seas were also very satisfied. 20-21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)