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mahabharat 5.168.30-31: भीष्म ने कहा - हे सारथि! इस युद्ध में मैंने दुर्योधन का भार, जो समुद्र के समान विशाल है, अपने कंधों पर उठाया है। वह दुःखद और रोमांचकारी समय, जिसके लिए मैं अनेक वर्षों से चिन्तित था, अब आ पहुँचा है। ऐसी स्थिति में मुझे यह आपसी मतभेद उत्पन्न नहीं करना चाहिए। इसीलिए तुम अभी तक जीवित हो।   |   mahabharat अध्याय 5.168: कौरवपक्षके रथियों और अतिरथियोंका वर्णन, कर्ण और भीष्मका रोषपूर्वक संवाद तथा दुर्योधनद्वारा उसका निवारण   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 168: कौरवपक्षके रथियों और अतिरथियोंका वर्णन, कर्ण और भीष्मका रोषपूर्वक संवाद तथा दुर्योधनद्वारा उसका निवारण  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  5.168.30-31 
भीष्म उवाच
समुद्यतोऽयं भारो मे सुमहान् सागरोपम:।
धार्तराष्ट्रस्य संग्रामे वर्षपूगाभिचिन्तित:॥ ३०॥
तस्मिन्नभ्यागते काले प्रतप्ते लोमहर्षणे।
मिथो भेदो न मे कार्यस्तेन जीवसि सूतज॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
भीष्म ने कहा - हे सारथि! इस युद्ध में मैंने दुर्योधन का भार, जो समुद्र के समान विशाल है, अपने कंधों पर उठाया है। वह दुःखद और रोमांचकारी समय, जिसके लिए मैं अनेक वर्षों से चिन्तित था, अब आ पहुँचा है। ऐसी स्थिति में मुझे यह आपसी मतभेद उत्पन्न नहीं करना चाहिए। इसीलिए तुम अभी तक जीवित हो।
 
Bhishma said - O son of a charioteer! In this war I have borne the burden of Duryodhan, which is as huge as the ocean, on my shoulders. The painful and thrilling time for which I had been worried for many years has now come. In such a situation I should not create this mutual difference. That is why you are still alive.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)