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mahabharat 5.168.25: वह अकेला ही सम्पूर्ण जगत् से सदैव स्पर्धा करता रहता है और अपनी क्षुद्र दृष्टि के कारण अन्य किसी को मनुष्य नहीं मानता ॥25॥   |   mahabharat अध्याय 5.168: कौरवपक्षके रथियों और अतिरथियोंका वर्णन, कर्ण और भीष्मका रोषपूर्वक संवाद तथा दुर्योधनद्वारा उसका निवारण   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 168: कौरवपक्षके रथियों और अतिरथियोंका वर्णन, कर्ण और भीष्मका रोषपूर्वक संवाद तथा दुर्योधनद्वारा उसका निवारण  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  5.168.25 
एकाकी स्पर्धते नित्यं सर्वेण जगता सह।
न चान्यं पुरुषं कंचिन्मन्यते मोघदर्शन:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
वह अकेला ही सम्पूर्ण जगत् से सदैव स्पर्धा करता रहता है और अपनी क्षुद्र दृष्टि के कारण अन्य किसी को मनुष्य नहीं मानता ॥25॥
 
He alone is always in competition with the entire world and due to his vain outlook does not consider anyone else as a human being. ॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)