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श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 167: कौरवपक्षके रथी, महारथी और अतिरथियोंका वर्णन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  5.167.7 
दोषस्त्वस्य महानेको येनैव भरतर्षभ।
न मे रथो नातिरथो मत: पार्थिवसत्तम॥ ७॥
 
 
अनुवाद
परन्तु हे भरतश्रेष्ठ! हे राजन! उसमें एक ही बड़ा दोष है, जिसके कारण मैं उसे न तो महान योद्धा मानता हूँ और न ही सारथि।
 
But, O best of the Bharatas! O king! There is only one big flaw in him, because of which I consider him neither a great warrior nor a charioteer at all.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)