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श्लोक 5.166.22  |
एष सेना: सुबहुला विविधायुधकार्मुका:।
अग्निवत् समरे तात चरिष्यति विनिर्दहन्॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| हे प्रिय! वह नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों और धनुषों से सुसज्जित होकर अग्नि के समान जलती हुई अनेक सेनाएँ लेकर युद्धभूमि में विचरण करेगा। |
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| O dear! He will roam the battlefield burning like fire many armies armed with various kinds of weapons and bows. |
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इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि रथातिरथसंख्यानपर्वणि षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १६६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत रथातिरथसंख्यानपर्वमें एक सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६६॥
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