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mahabharat 5.162.59: परन्तु स्मरण रखो, यदि मैं चाहूँ तो इन समस्त राजाओं को अपनी क्रोधाग्नि से वैसे ही भस्म कर सकता हूँ जैसे अग्नि घास-फूस को जला देती है। परन्तु युद्ध के अन्त तक मुझे ऐसा करने का अवसर नहीं मिलना चाहिए; यही मेरी इच्छा है।   |   mahabharat अध्याय 5.162: पाण्डवपक्षकी ओरसे दुर्योधनको उसके संदेशका उत्तर   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 162: पाण्डवपक्षकी ओरसे दुर्योधनको उसके संदेशका उत्तर  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  5.162.59 
जघन्यकालमप्येतन्न भवेत् सर्वपार्थिवान्।
निर्दहेयमहं क्रोधात् तृणानीव हुताशन:॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
परन्तु स्मरण रखो, यदि मैं चाहूँ तो इन समस्त राजाओं को अपनी क्रोधाग्नि से वैसे ही भस्म कर सकता हूँ जैसे अग्नि घास-फूस को जला देती है। परन्तु युद्ध के अन्त तक मुझे ऐसा करने का अवसर नहीं मिलना चाहिए; यही मेरी इच्छा है।
 
But remember, if I want, I can destroy all these kings with the fire of my anger just like fire burns grass and straw. But I do not want to get the opportunity to do so until the end of the war; this is my wish.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)